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रौशनी

जिस तरह चिराग तले  अँधेरा होता है उसी तरह ऊंची ऊंची इमारतों वाले शहरों में झोपड़पट्टियाँ होती हैं। ऐसी ही एक झोपड़पट्टी की एक तंग गली है। गली इतनी तंग है की अकेले व्यक्ति को भी भीड़ का एहसास होता है। इसी गली के अंत में एक छोटी सी कोठरी है। इसमें जलते हुए बल्ब की पीली मद्धिम रोशनी घुटन को और बढ़ा देती है। इसी कोठारी में रहता है लखन।
लखन कचरा बीनने क काम करता है। रोज़ वह एक बोरी लेकर घर से निकलता है और दिन भर खाली प्लास्टिक की बोतलें, प्लास्टिक की थैलियाँ  और अन्य प्लास्टिक के सामान बोरी में भरता रहता है। इससे उसे अपना पेट भरने लायक कमाई हो जाती है।
लखन जब आठ वर्ष का था तो वह अपनी सौतेली माँ के दुर्व्यवहार से तंग आकर  घर से भाग कर शहर आ गया। उसे लगा जैसे वह किसी तालाब से निकल कर बड़ी नदी में आ गया हो। फिर इस नदी का बहाव उसे मुंबई के समुद्र में ले आया। इस समुद्र में वह अकेला था। जल्द ही उसने हाथ पाँव मारकर तैरना सीख लिया।
एक दिन उसकी बस्ती में एक आदमी आया जो बोतल में बंद पानी पीता था। सुना था कि वह अमेरिका में कोई बड़ी नौकरी करता था। किन्तु सब कुछ छोड़ कर वह बस्ती में आया था। वह उन लड़कों का जीवन सुधारना चाहता था  जिन्हें कोई गिनती में भी नहीं लेता था । बस्ती में एक बंद पड़ी फैक्ट्री के गोदाम में उसने धीरे धीरे लड़कों को इकठ्ठा करना शुरू किया। सभी उसे 'सर' कह कर बुलाते थे।सर की बातें सभी बहुत अच्छी लगती थीं। वह कहते तुम सब भी जीवन में कुछ बड़ा कर सकते हो। बस थोड़ी मेहनत की ज़रुरत है। जिन लड़कों के हिस्से सदैव दुत्कार आई थी वो उन्हें प्यार से अपने पास बिठाते थे। लखन भी उनकी पाठशाला में शामिल हो गया। सभी लडके रोज़ वहां एकत्र होते। सर उन्हें थोडा बहुत पढाते थे। उसके बाद शुरू होती संगीत की क्लास। कोई गिटार बजाता कोई ढोलक तो कोई बांसुरी। बाकी लडके मिलकर गीत गाते थे।
लखन को ड्रम बजाना बहुत अच्छा लगता है । ड्रम स्टिटिक्स हाथ में आते ही जैसे वह कोई और हो जाता है ।
वह अपना दुःख दर्द सब भूल जाता है। सुनने वालों के पाँव  ड्रम की धुन पर थिरक उठते हैं। चिराग तले अँधेरे में रहने वाले लखन का चेहरा एक अजीब से आत्मिक संतोष से दमक उठता है।













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