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एहसास

कुणाल ने अपने राइटिंग पैड से एक और कागज़ फाड़ा फिर उसकी गेंद बनाकर हवा में उछाल दिया। उसका कमरा इन गेंदों से भरा हुआ था। पिछले चार दिनों से वह एक कहानी लिखने की सोंच रहा था। किन्तु जो भी लिखता था खोखला सा मालूम पड़ता था। शब्द थे लेकिन एहसास नहीं।
लेखन के क्षेत्र में तेज़ी से कदम बढ़ा रहे कुणाल ने कभी नहीं सोंचा था की प्रेम के विषय पर कहानी लिखना उसके लिए इतना मुश्किल होगा। वह शुरू से ही बहुत रोमांटिक रहा था। प्रेम के विषय में उसने कितना कुछ पढ़ा था। उपन्यास, कहानियां, कवितायेँ लेकिन आज जब लिखने बैठा तो स्वयं को इतना असमर्थ पा रहा था। कल रात यह निश्चय करके बैठा था कि कुछ लिख कर ही उठेगा। बहुत कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ।
हार कर उसने पैड पटक दिया ' बस अब दिमाग काम नहीं कर रहा है। कुछ देर बाहर घूम कर आता हूँ।' यह सोंच कर उसने अपना जॉगिंग सूट पहना और बाहर आ गया। सुबह होने में अभी वक़्त था। चारों ओर सन्नाटा था। अच्छी खासी ठंड थी। फिर भी ताज़ी हवा ने उसे बहुत सुकून पहुँचाया। जॉग करते हुए वह उस होटल तक आया जहाँ वह अक्सर चाय पीने आता था। उसकी नज़र सामने फुटपाथ पर सोये बूढ़े दंपत्ति पर पड़ी। उसने कई बार उन्हें यहाँ देखा था। वो उसी फुटपाथ पर भीख माँगते थे।
अचानक सोते हुए बूढ़े की नींद खुल गयी। उसने अपने ऊपर पड़े कम्बल को देखा जो जगह जगह से फटा हुआ था। वह उठा उसकी नज़र पास में पड़ी बुढिया  पर पड़ी। वह ठण्ड से ठिठुर रही थी। बूढ़े की आँखों में नमी उतर आई। जो स्ट्रीट लाइट में भी साफ़ नज़र आ रही थी। बूढ़े ने कम्बल उस बुढिया को ओढा दिया और प्यार से उसका माथा सहलाने लगा।
कुणाल के दिल में एक स्पंदन हुआ। जैसे अँधेरे में बिजली कौंधी हो। उसके शब्दों को एहसास मिल गया था। वह घर वापस लौट पड़ा।
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