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दरार


घर पहुँचकर अंकुर ने कॉलबेल दबाई. दरवाज़ा मेड ने खोला. अंकुर को आश्चर्य हुआ. अमूमन इस समय तक मेड अपने घर चली जाती थी.
"साहब चाय बना दूँ."
"नही"
"तो मैं घर जाऊँ."
अंकुर ने उसे घर जाने को कहा. उसकी आंखें ज्योती को खोजने लगीं. वह घर पर नही थी. बेडरूम में पहुँच कर उसने बैग बिस्तर पर डाल दिया. घड़ी उतार कर साइड टेबल पर रख रहा था कि उसकी नज़र मेज़ पर रखे कागज़ पर पड़ी. ज्योती का लिखा छोटा सा नोट था.
'मैं अब इस रिश्ते को जबरन खींच कर स्वयं को धोखा नही दे सकती. मैं पापा के पास जा रही हूँ.'
नोट पढ़ कर अंकुर बिस्तर पर गिर गया. वह उस पल को कोसने लगा जब वह अपनी भावनाओं पर काबू नही कर पाया. वैवाहिक जीवन की मर्यादा को तोड़ बैठा. अब उस एक कमज़ोर पल ने चिंगारी बन कर उसके सुखी जीवन में आग लगा दी थी.
अंकुर के मन में तूफान उठ रहा था. समझ नही पा रहा था कि इस बिगड़ी स्थिति को कैसे संभाले. विश्वास की जो डोर टूट गई थी उसे यदि जोड़ना भी चाहे तो गांठ पड़ ही जाएगी.

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