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यादों का सफर


ऑटो अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा था. महेंद्र ने अपनी पत्नी की गोद में सोए हुए अपने बेटे को देखा. वह एक वर्ष पूर्व हुई घटना को याद करने लगा.
अचानक ही उसका स्थानांतरण इस शहर में कर दिया गया था. ऐसा कोई नही था जिसकी देखरेख में अपनी सात माह की गर्भवती पत्नी को छोड़ देता. अतः उसे लेकर इस अनजान शहर में आना पड़ा. अभी कुछ ही घंटे हुए थे उन्हें आए हुए. सामान भी पूरी तरह नही खोला था. थके हुए पति पत्नी खाना खाकर सो रहे थे. तभी देर रात अचानक पत्नी को प्रसव पीड़ा आरंभ हो गई. महेंद्र इस स्थिति के लिए बिल्कुल भी तैयार नही था. अचानक आई इस मुसीबत से वह घबरा गया. किंकर्तव्य विमूढ़ सा वह बाहर आया और इधर उधर मदद के लिए देखने लगा. उसकी नज़र पड़ोस के मकान पर पड़ी. उसने कॉल बेल दबा दी.
कुछ क्षणों बाद एक अधेड़ उम्र सज्जन ने खिड़की से बाहर झांक कर पूंछा "कौन है."
महेंद्र ने उन्हें सारी बात बता दी.
"ठहरो मैं आता हूँ." उन्होंने कहा और भीतर चले गए.
कुछ ही देर में वह अपनी पत्नी के साथ बाहर आए. महेंद्र उन्हें अपने घर ले गया.
"इसे अस्पताल ले जाना होगा. आप जल्दी से कार निकालिए." उन सज्जन की पत्नी ने उनसे कहा.
जल्दी ही महेंद्र की पत्नी को अस्पताल में भर्ती करा दिया गया.
करीब एक घंटे के बाद डॉक्टर ने उसे पिता बनने की खुशखबरी सुनाई. बच्चा समय से पहले पैदा हुआ था अतः करीब एक महीने उसे अस्पताल में रखना पड़ा. इस दौरान दोनो पति पत्नी हर संभव सहायता करते रहे.
जब वह बच्चे को अस्पताल से घर लेकर आया तब उसे पता चला कि उसके मददगार पड़ोसी अपने नए फ्लैट में रहने जा रहे थे. जाने से पहले उन्होंने उसे अपना नया पता दिया.
महेंद्र और उसकी पत्नी अपने बेटे की परवरिश में व्यस्त हो गए. आज उनके बेटे का पहला जन्मदिन था. अतः उसे आशीर्वाद दिलाने के लिए दोनो उन सज्जन पति पत्नी के घर जा रहे थे.
ऑटो बिल्डिंग के नीचे रुका. वह दोनो फ्लैट नंबर 303 के सामने खड़े थे. दरवाज़ा खुला तो उन्हें देख दोनो पती पत्नी बहुत खुश हुए. उन्होंने बच्चे को गोद में लेकर उसे आशीर्वाद दिया.

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