सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अपना ठिकाना

विनय को मकान पसंद आया. उस अकेले के लिए पर्याप्त जगह थी. उसने आवश्यक अग्रिम राशि जमा कर दी.
अविवाहित विनय ने अपने छोटे भाइयों को पुत्रवत पाला था. उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए अपने सुखों का भी त्याग किया था. जीवन भर किराए के मकान में रहे. उनके परम मित्र राजेश अक्सर कहते थे "भाइयों के लिए कुछ करना बुरा नहीं पर अपने बारे में भी सोंचो. कल जब यह दोनों अपनी गृहस्ती बसा लेंगे तो तुम क्या करोगे. कहाँ रहोगे." लेकिन विनय अपने तर्क देते थे "मैं तो अकेली जान हूँ. दोनों भाइयों को बेटे की तरह पाला है. किसी के भी साथ रह लूँगा."
"ईश्वर करे आपका भरोसा सही निकले लेकिन मैं तो दुनिया का चलन देखते हुए कह रहा था." राजेश उन्हें दुनिया की सच्चाई दिखाने की कोशिश करते थे.
दोनों भाइयों ने अपनी अपनी गृहस्ती बसा ली. अवकाशग्रहण के बाद वह कभी एक के यहाँ तो कभी दूसरे के यहाँ जाकर रहते. कुछ दिन तो ठीक लगा परंतु धीरे धीरे उन्हें एहसास होने लगा कि यह व्यवस्था ठीक नहीं. प्रत्यक्ष तौर पर तो कोई कुछ नहीं कहता था लेकिन अक्सर ही अपने व्यवहार से दोनों भाई उन्हें इस बात का आभास कराते कि वह उनके घर में रह रहे हैं. 
देर से ही सही बात उनकी समझ में आ गई. उन्होंने अपने लिए अलग किराए का मकान ले लिया.
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/A/AshishKumarTrivedi/apanaThikana_Laghukatha.htm

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मुसाफिर

कल रात अचानक ही बंसल साहब का निधन हो गया। मोहल्ले में जब यह समाचार फैला तो लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उनके घर पर एकत्र हुए। अर्थी निकलने की तैयारी हो रही थी। मोहल्ले के दो बुज़र्ग खन्ना जी और पांडे जी बाहर बैठे बात कर रहे थे। "अरे यह तो सबके साथ होना है। हम सब तो मुसाफिर हैं। ना जाने कब स्टेशन आ जाए और उतरना पड़े।" पांडे जी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। "सही कहा पांडे जी। लेकिन तब भी इंसान माया में फंसा रहता है।" "सुना है बंसल किसी केस में फंसा था। पेंशन अटकी हुई थी।" "अजी जुगाड़ू बंदा था। ऊपर तक पहुँच थी। सब क्लियर हो गया।" खन्ना जी ने रहस्य खोला। "क्या लाभ ऐसे पैसे का। मरने पर इकलौता बेटा भी साथ नही है।"  "सही कहा पांडे जी। अब बेचारी मिसेज बंसल अकेली पड़ गईं।" "अब यह तो सबके साथ है। इस उम्र में जीवनसाथी का ही सहारा होता है।" "बिल्कुल सही। भाभी जी कैसी हैं।" "बेटे बहू के लिए हुड़कती रहती हैं।" "तो शेखर के पास क्यों नही चले जाते।" "उनकी अपनी जिंदगी है। दोनों वर्किंग हैं। वहाँ भी दिन...

भूचाल

लाला हरबंसलाल अपनी पुशतैनी हवेली के आंगन में बैठे थे. जो सामान ले जाया जा सकता था वह गठरियों में बंधा रखा था. उस पर एक नजर डाल कर उन्होंने गहरी सांस ली.  आंगन में गौरैया रोज़ की तरह फुदक रही थी. मुंडेर पर बैठा कौवा भी वैसे ही कांव कांव कर रहा था. प्रकृति का हर काम वैसे ही चल रहा था. कहीं कोई उथल पुथल नही थी सिवाय इंसानी ज़िदगी के. इंसानों के जीवन में भूचाल आया था. मजहब के नाम पर मुल्क दो हिस्सों में बंट गया था. इस बंटवारे ने बहुतों को उनकी जड़ों से अलग कर दिया था.

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...