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अपनी राह

नकुल असमंजस की स्थिति में था. उसके पास दो विकल्प थे. पिता चाहते थे कि वह उनकी लॉ फर्म में उनके साथ वकालत करे. जबकी राजनीति में ऊँचा स्थान रखने वाली माँ की इच्छा थी कि अपने आकर्षक व्यक्तित्व तथा व्यवहार कुशलता का प्रयोग कर राजनीति में अपनी पहचान बनाए. 
नकुल का झुकाव दोनों में से किसी भी तरफ नहीं था. बचपन से ही उसने अपने आस पास वैभव और प्रभुता का माहौल देखा था. अपने माता पिता को इस वैभव तथा प्रभुता की रक्षा के लिए परेशान होते देखा था. अतः वह कुछ ऐसा करना चाहता था जिसमें उसे आत्मिक शांति मिल सके. अनिर्णय की स्थिति में वह अपने कमरे में इधर से उधर टहल रहा था. तभी उसका मित्र चंदन उससे मिलने के  लिए आया.
चंदन एक पत्रकार था. सांसारिक दृष्टि से नकुल और चंदन में कोई समानता नहीं थी. वह एक साधारण परिवार का लड़का था. पत्रकारिता उसका पेशा नहीं बल्कि जीवन का उद्देश्य था. अपने आदर्शों से समझौता ना कर पाने के कारण अपने अन्य साथियों की भांति वह सफलता अर्जित नहीं कर पाया था. उम्र में भी वह नकुल से बड़ा था. किंतु फिर भी दोनों एक दूसरे के मित्र थे. चंदन नकुल की दुविधा के विषय में जानता था. कुर्सी पर बैठते हुए उसने पूंछा "तो क्या सोंचा तुमने. क्या करने का इरादा है."
कुर्सी खींच कर उसके पास बैठते हुए नकुल बोला "अभी तक तो कोई निर्णय नहीं ले पाया. पर जो भी करूँगा अपनी इच्छा से करूँगा. तुम बताओ आजकल किस खबर के पीछे हो."
"एक गरीब मजदूर की कहानी पर काम कर रहा हूँ. धोखे से उसकी किडनी निकाल ली गई. बेचारे की सुनने वाला कोई नहीं है."
"उसे तो डॉक्टर और अस्पताल पर केस कर देना चाहिए." नकुल ने गुस्से से कहा.
गंभीर स्वर में  चंदन  बोला "गरीब के लिए न्याय पाना आसान नहीं होता. कौन लड़ेगा उसका मुकदमा."
कुछ देर शांत रहने के बाद नकुल बोला "मैं अपनी राह चुन ली है. मैं उस मजदूर का केस लड़ूँगा." 
नकुल के चेहरे पर संतोष का भाव था.

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