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बंद मुठ्ठी

रश्मि सारा काम निपटा कर अपनी किताब लेकर बैठ गई. कुछ ही दिनों में बारहवीं की बोर्ड परीक्षाएं आरंभ होने वाली थीं. वह जी जान से तैयारी में जुटी थी. पढ़ लिख कर कुछ कर दिखाने की लगन थी उसके मन में. यही लगन थी कि इतनी समस्याओं के बावजूद भी उसने हिम्मत नहीं हारी थी. 
आज फिर जब वह स्कूल से लौट रही थी तब लल्लन ने फिर उसका रास्ता रोक लिया. आए दिन वह उसे छेड़ता था. बस्ती में सभी अनपढ़ थे. ऐसे में एक लड़की का पढ़ना उन्हें रास नहीं आता था. 
उस
उसकी माँ उसका सपना पूरा करने में  उसके साथ थी. सदैव उसे आगे बढ़ने का हौसला देती थी. नहीं तो उसके शराबी बाप ने कब का पैसों के लालच में उसकी शादी अपने बूढ़े दोस्त से करा दी होती. 
रश्मि इन सारी तकलीफों से घबराती नहीं थी. इस अंधेरे में भी उसके मन में आशा का इंद्रधनुष खिला था. सूरज को मुठ्ठी में कर लेने का सपना था.

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