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कंधा

विश्वनाथ बाबू अपने बेटे प्रत्यूष की तरक्की देख कर बहुत खुश थे. महज़ आठ सालों में महानगर में अपना फ्लैट ले लेना तथा रहन सहन का अच्छा स्तर बनाए रखना कोई मामूली बात नहीं थी.
जब से वह आए थे देख रहे थे कि घर के हर काम में प्रत्यूृष बहू के साथ बराबर हाथ बंटा रहा था. 
डिनर के बाद उन्होंने देखा कि वह अकेले ही रसोई का सामान समेट रहा था. बहू अपने लैपटॉप पर दफ्तर का कोई काम कर रही थी. उसका घर के कामों लगना उन्हें अच्छा नहीं लगा. अतः उन्होंने प्रत्यूष को अपने पास बुला कर कहा "यह क्या घर के काम में तुम क्यों पड़ते हो. यह काम तो बहू का है."
प्रत्यूष उन्हें समझाते हुए बोला "पापा हमने काम का बंटवारा नहीं किया है. बल्कि  घर की जिम्मेदारियां दोनों की साझा हैं. हम मिल कर गृहस्ती चलाते हैं. यह तरक्की जो आप देख रहे हैं उसमें रेनू का सहयोग मुझसे कम नहीं है. हम दोनों ही एक दूसरे का सहारा हैं"
विश्वनाथ बाबू उसकी बात पर मनन करने लगे.

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