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धुन


आज बहुत सर्दी थी. बाहर घना कोहरा था. रामसंजीवन ने लिहाफ हटाया और घड़ी की तरफ देखा. सुबह के छह बजे थे. वह बिस्तर से उठ गए.
तैयार होने के बाद उन्होंने नाश्ता किया और घर से निकल गए. जाड़ा, गर्मी, बरसात कुछ भी 62 साल के इस शख़्स को रोक नही पाता था. अपने मकसद के आगे उन्हें कुछ नही सूझता था.
एक गरीब पिछड़े परिवार में जन्मे रामसंजीवन ने कई परेशानियां झेल कर अपनी शिक्षा पूरी की. सरकारी नौकरी हांसिल की. लेकिन अवकाश ग्रहण करने के बाद जब वह गाँव वापस आए तो यह देख कर दुखी हुए कि आज भी गाँव में शिक्षा के प्रति जागरूकता का आभाव है. उन्होंने स्वयं को इसी उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया. अब गाँव के कई बच्चे स्कूल जाने लगे थे. फिर भी बहुत सी जानकारियां गाँव में उपलब्ध नही थीं. आवश्यक्ता गाँव को बाहरी दुनिया से जोड़ने की थी. इसका सबसे अच्छा तरीका था इंटरनेट.
उन्होंने निश्चय किया कि गाँव में एक कंप्यूटर प्रशिक्षिण केंद्र खोलेंगे. इस केंद्र में बच्चों को कंप्यूटर चलाना सिखाया जाएगा. जिससे वह इंटरनेट का इस्तेमाल कर देश विदेश की जानकारी प्राप्त कर सकें.
अपने इसी लक्ष्य के लिए वह सरकारी या गैरसरकारी सभी प्रकार की सहायता पाने के लिए गाँव तथा शहरों के चक्कर लगाते थे ताकि आगे वाली पीढ़ी अज्ञानता के अंधेरे से बाहर निकल सके.




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