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आक्रोश


मैं पुलिस स्टेशन में बैठा था. वह भी मेरे सामने खड़ा अपना बयान दे रहा था. अपनी आंखों के सामने उसे देख मेरा रोम रोम जल रहा था.
आज की शाम कितनी खुशनुमा थी. मेरा बेटा अपने प्रमोशन की खुशी में मुझे डिनर पर ले गया था. 
आज हम दोनों की मेहनत रंग लाई थी. उसने इस तरक्की के लिए रात दिन एक कर दिया था. बचपन से ही वह होनहार था. जीवन को लेकर उसका अपना एक सपना था. आगे बढ़ने का, समाज में अपना मुकाम बनाने का. एक हेड क्लर्क के रूप में मेरी तन्ख्वाह कम थी. लेकिन उसके सपने पूरा करना ही मेरी जिंदगी का लक्ष्य बन गया. उसकी माँ बीच सफर में ही चल बसी. माँ बाप दोनों की ज़िम्मेदारियां निभाईं मैने. आज उस तपस्या का फल मिला था.
हम दोनों घर लौट रहे थे कि मेरे बेटे ने कहा कि आज हम दोनों मीठा पान खाकर इस शाम को पूरा करेंगे. मुझे कार में बैठा छोड़ कर वह पान लेने सड़क के पार चला गया. 
मैं कार में बैठा उसे देख रहा था. तभी अचानक जोर का धमाका हुआ. एक तेज रफ्तार कार मेरे बेटे को उड़ा कर चली गई. कुछ पलों के लिए मैं सन्न रह गया. फिर कार से निकल कर अपने बेटे की तरफ भागा. वहाँ पहुँच कर उसका सर गोद में लिया. किंतु सब कुछ खत्म हो गया था. 
जिस कार ने टक्कर मारी उसे एक रईसजादा चला रहा था. वह नशे में था. कुछ ही मीटर जाकर कार पेड़ से टकरा गई. उसे मामूली चोटें आईं. लोगों ने उसे पुलिस को सौंप दिया. 
मेरी दुनिया तबाह करने वाला मेरे सामने था. मेरे भीतर द्वंद चल रहा था. जी चाह रहा था कि अभी उसको चीर डालूं. लेकिन चाह कर भी हैवान नही बन पा रहा था.

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