सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संवेदना


संगीता निश्चल बैठी शून्य में ताकती रहती थी. किसी भी बात की कोई प्रतिक्रिया ही नही देती थी.
उस हादसे ने परिवार के सभी सदस्यों को झझकोर दिया था. किंतु समय के साथ सभी धीरे धीरे उस दुख से बाहर आ गए. परिवार वालों की तमाम  कोशिशों के बावजूद भी संगीता अपने गम से बाहर नही आ पाई.
उसका सोलह साल का बेटा सबके देखते देखते बिजली का करंट लगने से मर गया. एक पारिवारिक कार्यक्रम में लापरवाही से एक नंगा तार जिसमें करंट था फर्श पर पड़ा था. असावधानी के कारण उनका बेटा उसकी चपेट में आ गया. जब तक कोई कुछ करता देर हो चुकी थी. संगीता की आंखों के सामने सब घटा. वह चीखी और उसके बाद से चार साल हो गए उसके मुख से  आज तक एक शब्द नही निकला.
आज सर्दी बहुत थी. घर में काम करने वाली अपने दो साल के बच्चे को लेकर आई थी. उसे एक जगह बिठा कर वह अपना काम करने लगी. बाकी सब भी अपने काम में व्यस्त थे. बच्चा अपनी जगह से उठा और इधर उधर देखते हुए संगीता के कमरे तक पहुँच गया. पहले वह कुछ ठिठका लेकिन संगीता की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना मिलने पर बेधड़क कमरे में घुस गया. वह कमरे के छोटे मोटे सामानों से खेलने लगा. तभी उसकी नजर रूमहीटर पर पड़ी. वह उसे अधिक आकर्षक लगा और वह उस चालू हीटर की तरफ लपका.
शून्य में ताकते हुए अचानक संगीता का ध्यान उस बच्चे की गतिविधि पर चला गया था. वह उसे ध्यान से देख रही थी. जैसे ही बच्चा हीटर की ओर लपका उसके मुख से चीख निकल गई. बच्चा डर कर ठिठक गया और रोने लगा. संगीता अपने बिस्तर से उठी और उसे चुप कराने लगी.
अचानक उसकी चीख सुन कर सभी उसके कमरे की तरफ भागे. वहाँ जो देखा उसे देख कर सब दंग रह गए.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मुसाफिर

कल रात अचानक ही बंसल साहब का निधन हो गया। मोहल्ले में जब यह समाचार फैला तो लोग उन्हें अंतिम विदाई देने उनके घर पर एकत्र हुए। अर्थी निकलने की तैयारी हो रही थी। मोहल्ले के दो बुज़र्ग खन्ना जी और पांडे जी बाहर बैठे बात कर रहे थे। "अरे यह तो सबके साथ होना है। हम सब तो मुसाफिर हैं। ना जाने कब स्टेशन आ जाए और उतरना पड़े।" पांडे जी ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा। "सही कहा पांडे जी। लेकिन तब भी इंसान माया में फंसा रहता है।" "सुना है बंसल किसी केस में फंसा था। पेंशन अटकी हुई थी।" "अजी जुगाड़ू बंदा था। ऊपर तक पहुँच थी। सब क्लियर हो गया।" खन्ना जी ने रहस्य खोला। "क्या लाभ ऐसे पैसे का। मरने पर इकलौता बेटा भी साथ नही है।"  "सही कहा पांडे जी। अब बेचारी मिसेज बंसल अकेली पड़ गईं।" "अब यह तो सबके साथ है। इस उम्र में जीवनसाथी का ही सहारा होता है।" "बिल्कुल सही। भाभी जी कैसी हैं।" "बेटे बहू के लिए हुड़कती रहती हैं।" "तो शेखर के पास क्यों नही चले जाते।" "उनकी अपनी जिंदगी है। दोनों वर्किंग हैं। वहाँ भी दिन...

भूचाल

लाला हरबंसलाल अपनी पुशतैनी हवेली के आंगन में बैठे थे. जो सामान ले जाया जा सकता था वह गठरियों में बंधा रखा था. उस पर एक नजर डाल कर उन्होंने गहरी सांस ली.  आंगन में गौरैया रोज़ की तरह फुदक रही थी. मुंडेर पर बैठा कौवा भी वैसे ही कांव कांव कर रहा था. प्रकृति का हर काम वैसे ही चल रहा था. कहीं कोई उथल पुथल नही थी सिवाय इंसानी ज़िदगी के. इंसानों के जीवन में भूचाल आया था. मजहब के नाम पर मुल्क दो हिस्सों में बंट गया था. इस बंटवारे ने बहुतों को उनकी जड़ों से अलग कर दिया था.

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...