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छट व्रती

शारदा छट पर्व की तैयारी में लगी थी. बीस वर्ष पू्र्व जब वह ब्याह कर आई थी तो उसकी सास ने व्रत का दायित्व उसे सौंप दिया था. तब से वह पूरे नियम कर्म से छट का व्रत कर रही थी. आंगन में बैठी उसकी सास छट मइया का गुणगान करते गीत गा रही थी. सारे घर में चहल पहल थी. सभी प्रसन्न थे. खुश तो उसकी बेटी विभा भी लग रही थी पर माँ होने के नाते शारदा उसके मन का दर्द समझ रही थी. अभी उन्नीस की हुई थी कि उसकी पढ़ाई छुड़वा कर ब्याह पक्का कर दिया गया. कुछ महीनों बाद ही ब्याह था. पर विभा आगे पढ़ना चाहती थी. अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी. उसने विरोध किया किंतु किसी ने उसकी नहीं सुनी. उसकी सारी इच्छाएं उसके मन में दब कर रह गई थीं. 
शारदा ने विभा को पास बैठा कर प्यार से पूंछा "बिटिया मन में उदास होने से क्या फायदा. औरत की अपनी मर्ज़ी नहीं चलती. उसे तो वही करना पड़ता है जो घर वाले चाहते हैं."
"अजीब है ना अम्मा सृष्टि के छटे अंश के रूप में छट माता को पूजते हैं किंतु औरत की इच्छा को कोई महत्व नहीं देते." यह कहते हुए विभा के चेहरे पर जो क्षोभ था वह शारदा के मन को चीर गया.
इस बार भी शारदा ने पूरे नियम से व्रत किया. अस्त होते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हुए उसने सूर्यदेव को साक्षी मान कर प्रण लिया कि उसकी बच्ची के दुख का वह अंत करेगी. अगले दिन उदित होते सूर्य की पूजा करने के बाद उसने सबको बता दिया कि अपनी बेटी के सपने पूरे करने में वह उसके साथ है.

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