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टिक टिक टिक


वैभव खिड़की पर खड़ा बाहर देख रहा था. विमला कमरे में आई तो देखा कि चाय टेबल पर रखी हुई ठंडी हो गई थी. उसने धीरे से वैभव के कंधे पर हाथ रखा. दोनों ख़ामोश खड़े एक दूसरे की पीड़ा को समझ रहे थे.
वैभव ने अपने भविष्य की योजनाएं बनाई थीं. इस साल बेटी दसवीं कक्षा  में थी. अपने कैरियर को लेकर वह पूर्णतया स्पष्ट थी. उसके कैरियर के लिए  पैसों की व्यवस्था कैसे करनी है फ्लैट की किश्तें कैसे चुकानी हैं इन सब के बारे में उसने सोंच लिया था. वह बहुत खुश था. सब कुछ उसकी योजना के मुताबिक ही चल रहा था.
पर बीते कुछ दिनों से स्वास्थ कुछ ठीक नहीं था. पहले तो उसने सोंचा कि मौसम के बदलाव के कारण ऐसा हो रहा है. पर जब परेशानी बढ़ गई तो उसने अपने फैमिली डॉक्टर को दिखाया. उनके इलाज से भी जब कोई फायदा नही हुआ तो डॉक्टर ने उसे विशेषज्ञ के पास भेज दिया.
विशेषज्ञ ने कई सारे टेस्ट करवाए. विमला घबरा गई. वैभव ने तसल्ली दी "तुम तो यूं ही परेशान हो जाती हो. देखना सब ठीक होगा."
रिपोर्ट अच्छी खबर लेकर नहीं आई. रिपोर्ट देख कर विमला रोने लगी..वैभव ने भर्राई हुई आवाज़ में पूँछा "डॉक्टर साहब कितना समय है मेरे  पास."
कुछ  क्षण शांत रहने के बाद डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा "आई एम सॉरी आप के पास अधिक दिन नहीं हैं. अधिक से अधिक तीन माह."
वैभव ने पास बैठी पत्नी तरफ देखा.  उसे लगा जैसे सब कुछ बिखर गया. अपनी तरफ बढती मौत के कदमों की आहट सुनाई देने लगी.

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