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आत्मिक सुख

बसेसर कुछ देर अपने आराध्य कान्हा जी के भजन गाने के इरादे से ढोलक लेकर बैठा ही था कि किसी ने दरवाज़ा खटखटाया. वह उठ कर गया तो सामने उसका मित्र गंगाधर खड़ा था.
"आओ भीतर आओ बहुत बाद दिखे." बसेसर ने उसे अंदर बुलाते हुए कहा.
गंगाधर फर्श पर बिछी चटाई पर बैठ गया. वह चिंतित दिख रहा था. उसके पास बैठते हुए बसेसर ने पूँछा "क्या बात है भाई बहुत परेशान दिख रहे हो."
"मैं बहुत उम्मीद से तुम्हारे पास आया हूँ. मेरी बेटी के कॉलेज के दाखिले के लिए मुझे बीस हजार रुपयों की ज़रूरत थी." गंगाधर ने हाथ जोड़ कर कहा "मैंने अपने भाई से कहा था पर आखिरी वक्त में वह मुकर गया. परसों फीस भरने की अंतिम तिथि है."
बसेसर उसे कुछ देर बैठने को कह कर भीतर चला गया. जब वह लौटा तो उसके हाथ में एक पैकेट था. 
"गिन कर देख लो पूरे बीस हजार हैं."
गंगाधर ने सजल नेत्रों से कहा "तुम्हारा बहुत उपकार. तुम ना होते तो बेटी का दाखिला ना हो पाता."
उसे धन्यवाद देकर गंगाधर चला गया. 
बसेसर ढोलक बजा कर पूरी तल्लीनता से कृष्ण भक्ति के गीत गाने लगा.
कल सुबह ही उसे बांके बिहारी के धाम के लिए निकलना था. जहाँ एक आश्रम में रह कर वह कुछ दिन शांति से बिताना चाहता था.

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