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भटकाव

जतिन ने माइक्रोवेव में खाना गर्म किया और डाइनिंग टेबल में बैठ कर खाने लगा. इस तरह अकेले खाते हुए उसे अच्छा नहीं लग रहा था. इधर कुछ महीनों से उसे अपना अकेलापन बहुत खलने लगा था.
वह अपने जीवन के बारे में सोंचने लगा. जवानी में उसने कभी भी अपने जीवन में एक साथी की कमी को महसूस नहीं किया था. वह अपने में ही मस्त था. उसे लगता था कि जीवन का आनंद एक जगह ठहरने में नहीं बल्की भ्रमर की तरह एक फूल से दूसरे फूल पर मंडराने में है. इस बीच उसके ना जाने कितने प्रेम प्रसंग हुए किंतु वह किसी भी रिश्ते को लेकर गंभीर नहीं रहा. 
उन्हीं दिनों में जया उसके जीवन में आई. वह बहुत ही सौम्य और सादगी पसंद थी. उसकी सादगी में एक आकर्षण था. जतिन उसकी खूबसूरती का दीवाना हो गया. जया  उसकी ही कंपनी में काम करती थी. वह इस रिश्ते को लेकर गंभीर थी और उसे एक मुकाम तक ले जाना चाहती थी. लेकिन जतिन का चंचल मन फिर भटकने लगा था. इस बात से जया बहुत आहत हुई. उसने वह नौकरी छोड़ दी और दूसरे शहर में चली गई.
जतिन का भटकना जारी रहा. वह किसी भी रिश्ते में अधिक नहीं ठहरता था. उसके मित्रों व शुभचिंतकों ने समझाना चाहा कि यह भटकन उसे एकाकीपन के अतिरिक्त कुछ नहीं देगी. पर जवानी के मद में चूर उसने किसी की बात नहीं सुनी.
जैसे जैसे उम्र बढ़ती गई जीवन में ठहराव की आवश्यक्ता महसूस होने लगी. उसे एक साथी की तलाश थी. लेकिन उसकी छवि ऐसी बन गई थी कि कोई भी लड़की अब उससे रिश्ता नहीं रखना चाहती थी. 
वह अकेला रह गया था. उसका एकाकीपन उसे काटने को दौड़ता था. उसके भटकाव ने उसे क्षणिक सुख तो दिए किंतु उसके आस पास एक बड़ा खालीपन पैदा कर दिया था. इस खालीपन में वह अकेला भटक रहा था. 
कल रात जब से वह अपने मित्र की शादी की सालगिरह से लौट कर आया था तब से उसे यह खालीपन बहुत खल रहा था. वह सोंच रहा था कि काश उसका साथ देने वाला भी कोई होता. 
खाना खाते हुए अचानक ही जया का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमने लगा.

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