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मौन बर्फ


पुलिस हिरासत में बैठी दीप्ती पूर्णतया मौन थी. उसके भीतर का तूफान थम चुका था. उसने जो किया उसके लिए उसे कोई अफसोस नहीं था. वह अपने पिछले जीवन के बारे में सोंचने लगी.
वह बी. ए. के अंतिम वर्ष में थी जब दिलीप ने एक विवाह समारोह में उसे देखा था. पहली ही नज़र में वह उसे पसंद करने लगा था. दोनों के बीच मुलाकातों का दौर शुरू हो गया. हर मुलाकात उन्हें एक दूसरे के और करीब ले आती थी. दोनों ने विवाह करने का निश्चय किया. दिलीप का इस दुनिया में कोई नहीं था. अतः उसने स्वयं ही दीप्ती के माता पिता से दोनों के रिश्ते की बात चलाई. उसकी सौम्यता दीप्ती के पिता को बहुत अच्छी लगी. बिजनेस भी अच्छा चल रहा था. अतः दीप्ती के माता पिता ने उनके विवाह के लिए हाँ कर दी. 
दीप्ती और दिलीप ने मिलकर खुशियों भरा एक संसार बसाया. दिलीप उसे पलकों पर बिठा कर रखता था. उसकी हर ख़्वाहिश पूरी करता था. उनके इस खूबसूरत संसार में उनकी बेटी परी के प्रवेश से माहौल और भी ख़ुशनुमा हो गया. इस तरह का सुखपूर्वक दस साल बीत गए. किंतु उनकी खुशियों को अचानक जैसे किसी की नज़र लग गई. एक बिजनेस टूर से लौटते हुए सड़क हादसे में दिलीप की मृत्यु हो गई.
इस अचानक आई विपदा से दीप्ती का जीवन बिखर गया. वह भावनात्मक रूप से टूट गई थी. उसे किसी के सहारे की आवश्यक्ता थी. इस मुश्किल दौर में दिलीप का बिजनेस मैनेजर सुधीर मदद के लिए आगे आया. उसने आश्वासन दिया कि वह बिजनेस की सारी ज़िम्मेदारी संभाल लेगा. दीप्ती को व्यापार के संचालन की कोई जानकारी नहीं थी. अतः उसने सुधीर का प्रस्ताव मान लिया. सुधीर ने बिजनेस का सारा काम संभाल लिया. कुछ आवश्यक फैसलों को छोड़ कर अधिकांश फैसले वह स्वयं ही लेता था.
बिजनेस के काम के लिए सुधीर अक्सर ही उसके घर आता था. उसके आने से परी बहुत खुश होती थी. थोड़े से समय में ही वह उससे घुलमिल गई थी. दीप्ती भी उसे पसंद करती थी. सुधीर सदैव उसका हौंसला बढ़ाता रहता था. उसे उसके दुख से बाहर निकालने की पूरी कोशिश करता था. दीप्ती उसमें अपना एक सच्चा हमदर्द देखने लगी थी. 
अपनेपन और हमदर्दी की आँच से दीप्ती के मन का दर्द पिघलने लगा. वह धीरे धीरे अपने दुख से बाहर आने लगी. अब कभी परी को लेकर तो कभी अकेली सुधीर के संग घूमने   या फिल्म देखने जाने लगी थी. ऐसे ही एक बार जब परी को घर पर छोड़ वह सुधीर के साथ डिनर पर गई थी तो सुधीर ने उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. वैसे तो वह भी सुधीर की तरफ आकर्षित होने लगी थी. किंतु वह बिना सोंचे समझे वह कोई फैसला नहीं करना चाहती थी. उसने सुधीर से कुछ समय मांग लिया.
उस रात वह सो नहीं सकी. वह पशोपश में थी. यह फैसला उसके और परी के जीवन में बहुत गहरा असर करने वाला था. एक तरफ उसे लगता था कि किशोरावस्था की ओर बढ़ती उसकी बेटी के सर पर पिता का साया आवश्यक है. सुधीर और परी के संबंध बहुत दोस्ताना थे. उसे पिता के रूप में स्वीकार करना परी के लिए मुश्किल नहीं होगा. लेकिन जब अपने विषय में सोंचती थी तो उसे अपराधबोध महसूस होता था. दिलीप को गए अभी एक साल ही हुआ था. उसे लगता था कि सुधीर से विवाह करके वह दिलीप के साथ अन्याय तो नहीं करेगी. बहुत देर तक अनेक सवालों से जूझने के बाद उसने परी की खातिर रिश्ते के लिए हाँ करने का मन बना लिया.
एक सादे समारोह में सुधीर और दीप्ती का विवाह हो गया. एक पति और पिता के तौर पर सुधीर ने सब कुछ अच्छे से संभाल लीं. परी को कुछ समय लगा पर उसने भी उसे स्वीकार कर लिया. अब दीप्ती आँख मूंद कर उस पर यकीन करने लगी थी. पहले तो सुधीर बिजनेस के मामले में अक्सर उससे सलाह लेता था पर अब उसे कुछ भी नहीं बताता था. केवल कुछ कागज़ातों पर उससे दस्तख़त लेता रहता था.
छह महीनों में ही सुधीर ने अपना रंग बदल दिया. अब अक्सर देर रात से घर आता था. कुछ पूंछने पर दीप्ती से झगड़ा करता था. परी की तरफ कोई ध्यान नहीं देता था. दीप्ती से उसका रिश्ता केवल शरीर तक ही सीमित रह गया था.
कल रात भी सुधीर देर से लौटा. दीप्ती ने तबीयत ठीक ना होने का बहाना कर उसे टाल दिया. वह बिना किसी विरोध के चुपचाप चला गया. दीप्ती लेटे हुए सोंच रही थी. पहली बार ऐसा हुआ था कि सुधीर अपनी संतुष्टि किए बिना चुप चाप कमरे से चला गया. उसे उसकी किसी तकलीफ से कोई मतलब नही रहता था. दीप्ती केवल उसके मन बहलाव का साधन थी. आज उसने सर दर्द की शिकायत की तो बिना कुछ कहे निकल गया. पिछले कई दिनों से उसे महसूस हो रहा था कि सुधीर अब उसमें कम दिलचस्पी लेता था. वह सोंचने लगी लगता है कोई और मछली फंसा ली है उसने.
दीप्ती पछता रही थी. सुधीर पर यकीन कर उसने भारी भूल की थी. 
वह समझ गई थी कि उससे विवाह करना महज़ एक जाल था. अब उसके पति की जायदाद पर भी उसका अधिकार हो गया था. दीप्ती उसके हाथ का खिलौना बन कर रह गई थी. अपनी बच्ची के भविष्य के बारे में सोंच कर वह पिछले कुछ महीनों से सब कुछ चुप चाप सह रही थी.
वह अपने विचारों में उलझी थी कि अचानक दीप्ती को अपनी बच्ची की चीख सुनाई दी. 'सुधीर' उसके मन में यह खयाल आते ही वह तेज़ी से अपनी बेटी के कमरे की तरफ भागी. रास्ते में डाइनिंग टेबल से उसने फलों को काटने का चाकू उठा लिया. शेरनी की तरह भागती हुई वह कमरे में पहँची. वहाँ का नज़ारा देख उसकी नसों में लावा दौड़ने लगा. बिजली की गति से वह सुधीर पर झपट पड़ी. वह पूरी ताकत से उस पर वार कर रही थी.
अगले दिन अखबार मे सुर्खियां थीं. 'पहाड़ों पर शांत बर्फ ने ढाया तूफान'
'पत्नी ने की अपने पति की हत्या'. उसे गिरफ्तार कर पुलिस थाने ले आई थी. परी को दीप्ती के माता पिता अपने साथ ले गए थे.
दीप्ती के मन में कोई मलाल नहीं था. एक राक्षस से उसने अपनी बेटी को बचा लिया था.

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