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राह


सौम्य के मित्रों रिश्तेदारों और बड़े से सर्किल में जिसने भी सुना वह चौंक गया. सभी केवल एक ही बात कह रहे थे 'भला यह भी कोई निर्णय हैं.'
सबसे अधिक दुखी और नाराज़ उसकी माँ थीं. होतीं भी क्यों नही. पति की मृत्यु के बाद कितनी तकलीफें सह कर उसे बड़ा किया था. 
"इसे निरा पागलपन नही तो और क्या कहेंगे. इस उम्र में इतनी सफलता यह ऊपर वाले की कृपा ही तो है. तुम्हारे लिए इन सबका कोई मूल्य नही है." माँ ने बड़े निराश भाव से कहा.
"क्यों नही है माँ. मैं ईश्वर का शुक्रगुज़ार हूँ. तभी तो उसकी संतानों की सेवा कर उसका शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ." सौम्य ने अपना पक्ष रखा. 
"सारी दुनिया के गरीब बेसहारा लोगों के लिए एक तुम ही तो बचे हो." माँ ने ताना मारा.
सौम्य नही जानता था कि वह अकेला है या इस राह के और भी राही हैं. परंतु उसके भीतर एक कीड़ा था जो उसे पिछले कई दिनों से कुछ करने को उकसा रहा था. 
ऐसा नही था कि यह निर्णय उसने भावावेश में बिना कुछ सोंचे समझे ले लिया था. दरअसल विद्यार्थी जीवन से ही उसकी सोंच औरों से अलग थी. सदा से ही वह देश और समाज के लिए कुछ करना चाहता था. 
ऐसा भी नही था कि वह स्वयं को बर्बाद कर दूसरों के लिए कुछ करने वाला था. फर्क इतना था कि उसकी सोंच अपने तक ही सीमित नही थी. अब तक उसने जितना अर्जित किया था उससे उसकी माँ का जीवन आराम से कट सकता था. जहाँ तक उसका प्रश्न था. उसने अपनी आवश्यक्ताओं को बहुत सीमित कर लिया था. 
अब पीछे हटना अपने आप को धोखा देना था. अतः कुछ भी उसे विचलित नही करता था. सारे तानों उपहासों को अनसुना कर वह अपने पागलपन में मस्त जो ठाना था उसे पूरा करने के लिए आगे बढ़ रहा था.
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