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मेरा फर्ज़

थाना प्रभारी रौशनी ने हवलदार से पूंछा "वह जो नवजात बच्ची हमें सड़क किनारे पड़ी मिली थी उसके माता पिता का कुछ पता चला."
"जी नहीं मैडम, कुछ पता नहीं चला."
"मीडिया में यह खबर बहुत चर्चा में है. शायद कोई उसे गोद लेने के लिए ही सामने आ जाए."
"कोई नहीं आएगा मैडम. यहाँ बेटियों को लोग त्याग देते हैं. अपनाते नहीं हैं." हवलदार ने दार्शनिक भाव से कहा.
"अगर कोई सामने नहीं आया तो मैं सोंचती हूँ कि उसे कानूनी तौर पर गोद ले लूँ." रौशनी ने सोंचते हुए कहा.
"आपके तो अपने बच्चे हैं. आप क्यों उसे गोद लेंगी."
हवलदार का प्रश्न सुन कर रौशनी अतीत में खो गई. पाँच साल की रौशनी को उसके माता पिता रेलवे स्टेशन पर छोड़ कर चले गए. वह कोने में बैठी रो रही थी. तभी एक दंपत्ति की निगाह उस पर पड़ी. दोनों तीर्थ यात्रा पर निकले थे. पत्नी ने प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूंछा "क्या नाम है तुम्हारा बेटा. तुम्हारे माता पिता कहाँ हैं."
उसने रोते हुए बताया "मम्मी पापा अभी आ रहे हैं कह कर ना जाने कहाँ चले गए."
उन लोगों ने उसे पुलिस के हवाले कर दिया. जब कोई भी उसे लेने नहीं आया तो उन्होंने उसे कानूनी तौर पर गोद ले लिया. उनके अपने बच्चे भी थे. फिर भी उन्होने उसे कभी पराया नहीं समझा. उन्हीं के प्रोत्साहन से वह पुलिस में भर्ती हो सकी थी.
हवलदार की ओर देख कर वह बोली "मैं गोद लूँगी. अब फर्ज़ निभाने की मेरी बारी है."

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