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निज भाषा

अमर की नियुक्ति शहर के एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में हिंदी शिक्षक के तौर पर हुई. यह देख कर उसे दुःख हुआ की हिंदी भाषा के प्रति विद्यार्थियों में कोई लगाव नहीं था.  हिंदी को केवल ऐसे विषय  के रूप में देखते थे जिसमें केवल उत्तीर्ण हो जाना ही बहुत था. अमर इस  स्तिथि को बदल देना चाहता था.
स्कूल में विद्यार्थियों के के चहुँमुखी विकास के लिए पाठ्यक्रम के अतिरिक्त और भी गतिविधियां होती थीं. इसके लिए विद्यार्थियों को अलग से ग्रेड दिया जाता था.  प्रधानाचार्य से कह कर अमर ने स्कूल में हिंदी माह मनाने का फैसला किया. इसके तहत हिंदी में वाद विवाद, लेखन एवं हिंदी साहित्य पर परिचर्चा को शामिल  किया गया. अच्छे ग्रेड के लिए विद्यार्थियों ने पुस्तकालय में जाकर हिंदी की पुस्तकें पढना शुरू किया. धीरे धीरे  उनकी रूचि हिंदी साहित्य में बढ़ने लगी. अब बहुत से विद्यार्थी ग्रेड के लिए नहीं बल्कि प्रेम के कारण हिंदी पढ़ते थे.
नतीजा  यह हुआ कि स्कूल की पत्रिका में हिंदी का खंड जोड़ा गया जिसमें विद्यार्थियों ने बढ़ चढ़ कर लिखा.

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ना मे हाँ

सब तरफ चर्चा थी कि गीता पुलिस थाने के सामने धरने पर बैठी थी। उसने अजय के खिलाफ जो शिकायत की थी उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई थी।  पिछले कई महीनों से गीता बहुत परेशान थी। कॉलेज आते जाते अजय उसे तंग करता था। वह उससे प्रेम करने का दावा करता था। गीता उसे समझाती थी कि उसे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। वह सिर्फ पढ़ना चाहती है। लेकिन अजय हंस कर कहता कि लड़की की ना में ही उसकी हाँ होती है।  गीता ने बहुत कोशिश की कि बात अजय की समझ में आ जाए कि उसकी ना का मतलब ना ही है। पर अजय नहीं समझा। पुलिस भी कछ नहीं कर रही थी। हार कर गीता यह तख्ती लेकर धरने पर बैठ गई कि 'लड़की की ना का सम्मान करो।'  सभी उसकी तारीफ कर रहे थे।

केंद्र बिंदु

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दिया

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