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डिग्री

विमल हारा थका फिर उसी छोटे से होटल में पहुँचा जहाँ वह अक्सर चाय पीने के लिए जाता था. होटल के मालिक से पहचान हो गई थी. वह उसकी नौकरी की जद्दोजहद के बारे में जानता था. उसे उदास देख पास आकर बोला "क्या हुआ विमल बाबू आज भी नौकरी नहीं मिली."
बिना कुछ बोले विमल ने सिर्फ सर हिला कर हाँ कर दी. होटल का मालिक उसके पास आकर बैठ गया.
"हिम्मत मत हारो सब ठीक हो जाएगा."
"कुछ ठीक नहीं होगा. अब तो मैं पूरी तरह टूट गया हूँ. मन करता है कि नदी में छलांग लगा दूँ." अपने हाथों से चेहरा छिपा कर वह सिसकने लगा. होटल के मालिक ने उसके कंधे पर हाथ रख कर उसे सांत्वना देनी चाही. जब विमल कुछ शांत हो गया तो वह बोला "बुरा ना मानो तो एक बात कहूँ. नौकरी के लिए भटकने की बजाय तुम अपना कोई काम क्यों नहीं शुरू करते."
"कोई काम करने के लिए तो बहुत पैसे चाहिए."
"बड़ा नहीं कोई छोटा काम. तुमने बताया था कि तुम बहुत अच्छी चाट बना लेते हो. यदि तुम चाहो तो मैं अपने होटल के बाहर की जगह तुम्हें दे सकता हूँ. पैसों से भी मदद कर दूँगा. मुनाफा आपस में बांट लेंगे."
विमल कुछ देर सोंचता रहा फिर बोला "अब कॉलेज की डिग्री इसलिए तो नहीं ली थी कि चाट बेचूँ."
होटल मालिक बोला "निर्णय तुम्हारा है. नदी में कूदने से तो यही अच्छा है."
यह कह कर वह अपने काम में लग गया.

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