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इंतज़ार


सिमरन ने किताब के बीच दबी तस्वीर निकाली. एक छबीला सा नौजवान सेना की वर्दी में था. सिमरन सत्रह साल पीछे चली गई. 
अमनदीप जाने को तैयार था. सिमरन बड़ी मुश्किलों से अपने पर काबू किए थी. अभी आठ दिन पहले ही तो उनकी सगाई हुई थी. सिर्फ एक हफ्ता रह गया था ब्याह में. तभी संदेशा आ गया. कारगिल में युद्ध की स्थिति बन गई थी. अतः अमनदीप को जाना पड़ रहा था. 
सिमरन अधिक देर काबू नही रख पाई. आंखें बरसने लगीं. अमनदीप ने समझाया "रोती क्यों है. देखना जल्द ही दुश्मनों के छक्के छुड़ा कर मैं वापस आऊंगा." सिमरन को तसल्ली दे कर वह चला गया. 
युद्ध समाप्त हो गया. ना वह आया और ना ही उसकी मृत्यु की खबर. उसका नाम तो गुमशुदा लोगों की लिस्ट में था. 
तब से सिमरन उसका इंतज़ार कर रही थी. परिवार समाज किसी की भी नही सुनी उसने. उसका दिल उस निर्जन पगडंडी की तरह हो गया था जिस वर्षों पहले अमनदीप के कदम पड़े थे. अब किसी और को वहाँ कदम रखने की इजाज़त नही थी.

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