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छलिया


वह पगडंडी सूनी पड़ी है. अब वहाँ से कोई नही गुजरता है. बस उसकी वापसी की प्रतीक्षा रहती है. वह प्रतिदिन उसी स्थान पर आकर बैठ जाती है जहाँ अंतिम बार उसे विदा किया था. मथुरा जाते हुए उसके रथ को रोक कर नेत्र भर उसे देखा था. नेत्रों की प्यास तो नही बुझी थी किंतु वह उसे रोक भी नही पाई थी. वैसे तो उसके प्रेम को यह अधिकार था कि उसे जाने ना देती. किंतु सच्चे प्रेम की यही दुर्बलता है कि वह अधिकार नही जता पाता है. उसके कर्मपथ पर रोड़ा नही बनना चाहती थी. अतः उसे जाते हुए देखती रही तब तक जब तक कि अश्रुओं ने दृष्टि को बाधित नही कर दिया. 
आज भी बैठी थी वह. उसके कान और आंखें पूरी तरह सजग थे. हल्की आहट भी यदि कान सुनते तो नेत्र उतावले हो पगडंडी पर भागने लगते. इस उम्मीद से कि शायद उसका रथ वापस आता दिखे. किंतु जल्द ही हताश होकर वापस आ जाते. वह सोंचने लगी 'कैसा निर्मोही है. एक बार पलट कर भी नही देखा. निर्मोही क्या अभिमानी है. यह भी नही समझा कि वृंदावन के कण कण का ऋणी है वह. यहाँ की कुंज लताओं, गउओं, पशु पक्षियों गोपियों सभी के निश्छल प्रेम के कारण ही तो उसकी पहचान है. हम ना होते तो कौन सुनता उसकी मुरली की तान को. गोपियां ना होतीं तो किनके साथ रचाता रास किनसे करता बरजोरी. आज हमें ही बिसरा दिया.' लेकिन फिर दिल के भाव बदल जाते. 'नही अभिमानी नही है. ऐसा होता तो क्या वन लताओं पशु मनुष्य सबसे एक जैसा प्रेम करता. घर में माखन भरा होने पर भी ग्वालों संग माखन चोरी करता. वह तो सिर्फ हमारे सुख के लिए था. प्रेम तो उसका निश्छल था तभी तो रास में सभी गोपियों के साथ सम रहता था. उसकी मुरली के स्वर तो वृंदावन के प्राण हैं. ऋणी तो यह वृंदावन है उसका.' उस निर्जन पगडंडी पर सुबह से शाम तक वह उसकी प्रतीक्षा करती थी. उसके हृदय में ऐसे ही विचार उठते और खत्म हो जाते. हर सांझ वह अगले दिन उसके लौटने की आशा ले घर लौट जाती.
छलिया

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