सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

सहारा

सिन्हा साहब की किताबों की एक बड़ी दुकान थी. यहाँ पाठ्यपुस्तकों से लेकर साहित्य संबंधी सभी प्रकार की पुस्तकें मिलती थीं. इसे सिन्हा साहब ने बड़ी मेहनत से बनाया था. श्रीमती सिन्हा व्वहार कुशल तथा दक्ष गृहणी थीं. 
दिव्या उनकी एकमात्र संतान थी. उनका सपना अपनी बेटी को पढ़ा लिखा कर योग्य बनाना था. अतः उसकी शिक्षा पर विशेष ध्यान देते थे. दिव्या सिन्हा वंश की अकेली लड़की थी. वह स्वयं तीन भाई थे. उनके दोनों भाइयों के भी पुत्र ही थे. अतः सिन्हा साहब की माता जी जब भी उनके घर रहने आतीं तो हमेशा ही इस बात की शिकायत करती थीं. अक्सर कहती थीं कि दोनों पति पत्नी को पुत्र प्राप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए. उन दोनों को पूजा पाठ व्रत तथा अन्य उपाय सुझाती थीं. 
सिन्हा साहब उन्हें समझाते कि अम्मा लड़के लड़की से कोई फर्क नही पड़ता है. ईश्वर ने हमें जो दिया है उससे मैं खुश हूँ. अब बस दिव्या की अच्छी परवरिश ही हमारा कर्तव्य है.
उनकी माता जी तर्क देतीं कि बेटी को चाहे कितना पढ़ा लिखा दो बुढ़ापे की लाठी तो बेटा ही होता है. बेटी तो पराया धन है एक दिन ससुराल चली जाएगी. 
लेकिन दोनों पति पत्नी का मन पक्का था. उन्हें बेटे की कोई चाह नही थी. धीरे धीरे माता जी ने भी कहना छोड़ दिया. 
दिव्या बहुत होनहार थी. पढ़ाई में अव्वल रहने के साथ साथ खेल कूद वाद विवाद प्रतियोगिता आदि में भी भाग लेती थी. बाहरवीं की बोर्ड परीक्षा में उसे दूसरा स्थान मिला था. बीकॉम में भी उसने अपने कॉलेज में टॉप किया. 
उसने सीए के पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था. पढ़ाई अच्छी चल रही थी. लेकिन समय अचानक ही पलट जाता है. अचानक ही सिन्हा साहब गंभीर रूप से बीमार हो गए. जांच से पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया था. 
उसका इलाज लंबा और महंगा था. सिन्हा साहब अब बुक शॉप पर नही बैठ पाते थे. श्रीमती सिन्हा रात दिन उनकी तिमारदारी करती थीं. ऐसे में आर्थिक बोझ बढ़ने के साथ साथ घर की व्यवस्था भी बिगड़ गई थी.
दिव्या बहुत दुःखी थी. वह अपने माता पिता की सहायता करना चाहती थी. अतः वह घर के कामों में माँ की सहायता करने लगी. किंतु समस्या मात्र इतनी नही थी. बुक शॉप बंद थी. घर की आय का एकमात्र स्रोत वही थी. जो भी जमा पूंजी थी वह इलाज और घर खर्च के कारण दिनों दिन कम होती जा रही थी. घर में मासिक आय के स्रोत की बहुत आवश्यक्ता थी. दिव्या ने स्वयं नौकरी करने का फैसला किया.
सिन्हा साहब की माता जी अब उनके घर रहने आ गई थीं. वह भी घर के कामों में सहायता करती थीं. एक दिन वह अपने बेटे के पास बैठी थीं तो उन्हें समझाते हुए बोलीं "इसीलिए मैं कहती थी कि बेटे का होना जरूरी है. आज अगर एक बेटा होता तो तुम्हारी दुकान संभाल लेता. कितनी मेहनत और लगन से तुमने व्यापार खड़ा किया था." वहाँ से गुजरती दिव्या ने यह बात सुन ली. 
दिव्या के मन में उहापोह था कि क्या करे. नौकरी करे या पिता के व्यवसाय को पुनः आरंभ करे. किंतु उसने जल्द ही फैसला कर लिया. वह पिता की बुक शॉप पर बैठेगी. अपनी दादी के विरोध को उसने अपने तर्कों से शांत कर दिया.
प्रारंभ में उसे अनेक मुश्किलें आईं लेकिन उसने डट कर उनका मुकाबला किया. थोड़े ही समय में गाड़ी पटरी पर आ गई. धीरे धीरे उसने पुस्तकों से अपनी पहचान बना ली. लोगों को पुस्तक चुनने में सहायता करती थी. इससे ग्राहकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी. फिर वह दिन भी आया जब अपनी पहली कमाई लाकर उसने माता पिता को अर्पित की. दोनों पति पत्नी खुशी से गदगद हो गए. दादी की आंखों में भी प्रशंसा के भाव थे.  

सहारा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

केंद्र बिंदु

पारस देख रहा था कि आरव का मन खाने से अधिक अपने फोन पर था। वह बार बार मैसेज चेक कर रहा था। सिर्फ दो रोटी खाकर वह प्लेट किचन में रखने के लिए उठा तो पारस ने टोंक दिया। "खाना तो ढंग से खाओ। जल्दी किस बात की है तुम्हें।" "बस पापा मेरा पेट भर गया।" कहते हुए वह प्लेट किचन में रख अपने कमरे में चला गया। पारस का मन भी खाने से उचट गया। उसने प्लेट की रोटी खत्म की और प्लेट किचन में रख आया। बचा हुआ खाना फ्रिज में रख कर वह भी अपने कमरे में चला गया। लैपटॉप खोल कर वह ऑफिस का काम करने लगा। पर काम में उसका मन नही लग रहा था। वह आरव के विषय में सोच रहा था। उसने महसूस किया था कि पिछले कुछ महीनों में आरव के बर्ताव में बहुत परिवर्तन आ गया है। पहले डिनर का समय खाने के साथ साथ आपसी बातचीत का भी होता था। आरव उसे स्कूल में क्या हुआ इसका पूरा ब्यौरा देता था। किंतु जबसे उसने कॉलेज जाना शुरू किया है तब से बहुत कम बात करता है। इधर कुछ दिनों से तो उसका ध्यान ही जैसे घर में नही रहता था। पारस सोचने लगा। उम्र का तकाज़ा है। उन्नीस साल का हो गया है अब वह। नए दोस्त नया माहौल इस सब में उसने अपनी अलग दुनि...

बुआ दादी

पांच साल का बिट्टू समझ नही पाता था कि क्यों बुआ दादी सिर्फ सफेद साड़ी पहनती हैं. वह मम्मी और दादी की तरह लाल बिंदी लगाने की जगह चंदन का टीका क्यों लगाती है. आखिरकार उसने बुआ दादी से ही पूंछा. उस बाल विधवा की दबी हुई पीड़ा को इस बच्चे ने उभार दिया. क्या बताती कि होश संभालने से पहले ही पति को खो देने के दंड में समाज ने उसे इन बेड़ियों में जकड़ रखा है.

जन्मदिन का तोहफा

नकुल ने अपना गुल्लक खोला और अपनी जमा पूंजी को गिना. अभी भी बहुत पैसे इकठ्ठे करने हैं. पिछले तीन महिनों से वह पैसे बचा रहा था. आइसक्रीम चॉकलेट्स की अपनी इच्छा को दबाकर सारी पॉकेटमनी जमा कर देता था. इस बीच पड़े अपने जन्मदिन पर कपड़ों के लिए मिले पैसे भी उसने खर्च नही किए. घर में सभी जानते थे कि वह पैसे बचा रहा है पर क्यों यह एक रहस्य था. वह किसी को कुछ नही बताता था. घर वाले यह सोंच कर खुश थे कि इसी बहाने बचत की आदत पड़ रही है. नकुल पढ़ने लिखने में बहुत होशियार था. सदैव अच्छे अंक लाता था. उसे यदि कोई टक्कर दे पाता था तो वह था उसका बेस्ट फ्रेंड संजीव. संजीव भी एक मेधावी छात्र था. नकुल और उसके बीच एक स्वस्थ प्रतियोगिता चलती थी कि देखें इस बार कौन कक्षा में प्रथम आता है. दोनों में आपस में बहुत प्रेम था. हलांकि दोनों के परिवारों की आर्थिक स्थिति में बहुत फ़र्क था. नकुल के माता पिता दोनों बहुत अच्छा कमाते थे. उसके घर में किसी चीज़ की कमी नही थी. जबकी संजीव के पिता एक छोटी सी दुकान चलाते थे. घर में प्रायः पैसों का आभाव रहता था. संजीव पढ़ने में अच्छा था इसीलिए उसकी फीस माफ थी तथा उसे छात्...