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मेहनत की खुशबू


उसने पिता से विरासत में मिले जमीन के उस टुकड़े को देखा. ऊबड़ खाबड़. पत्थर ही पत्थर भरे थे. पत्नी ने व्यंग किया ‘जब किसी की किस्मत पर ही पत्थर पड़े हों तो क्या.’ किंतु उसने उसने व्यंग को अनसुना कर दिया. किस्मत से हार मानना तो उसने सीखा ही नहीं था. बहुत समय पहले उसने पढ़ा था कि इंसान की इच्छा शक्ति पहाड़ भी हिला सकती है. उसके मन में भी एक संकल्प था. वह जुट गया अपने लक्ष्य को पाने के लिए. रात दिन एक कर दिए. पसीने की बूंदों से कर्मबीज फलित हुए. चारों तरफ लहलहाते फूलों की छटा थी. बंजर जमीन चमन बन गई थी. पत्थरों से मेहनत की खुशबू आने लगी थी.

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