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बंधन


वह जीतेंद्रिय था. कई साल पहले ही उसने सांसारिकता के समस्त बंधनों को तोड़ डाला था. अब तपस्या ही उसका संसार थी. कई वर्षों से वह पहाड़ की इस निर्जन गुफा में रह रहा था. केवल भिक्षा मांगने ही नीचे बसे ग्राम में जाता था. 
धम्म की शरण में आने से पूर्व वह वैद्य था. अपने औषधीय ज्ञान से उसने बहुत ख्याति एवं धन संपदा एकत्र की थी. किंतु कुछ भी उसके काम नही आया. उसके एकमात्र प्रिय पुत्र के प्राणों की रक्षा वह नही कर सका. धम्म के शरणागत होकर ही उसे शांति मिली. अब तो संसार से पूर्णतया विमुख हो गया था. 
अन्न वह कड़ी है जो सन्यासियों को भी संसार से जोड़ती है. अन्न समाप्त हो गया था. उसने पहाड़ की तलहटी में बसे गांव में जाकर भिक्षा मांगने का निश्चय किया. जब वह लौट रहा था तब झाड़ियों में उसे कोई जीव पड़ा हुआ दिखाई दिया. कौतुहलवश पास गया तो देखा कि वह एक मृग शावक था जो घायल पड़ा था. उसकी पीड़ा उसके नेत्रों में स्पष्ट दिख रही थी. करुणा सन्यासियों का गुण है. उसने उस शावक को उठा लिया और गुफा में ले आया. उसे पता था कि कौन सी वनष्पति पीड़ाहारी है. वह शावक का उपचार करने लगा.
थोड़ी ही सेवा से शावक स्वस्थ हो गया. स्वस्थ होते ही उसकी चंचलता लौट आई. जब वह ध्यान में बैठता तो उसके आस पास कुंलाचे भरता. जब वह आराम करता तो उसके पास आ जाता. अक्सर वह शावक को गोद में लेकर पुचकारता था. उसके एकाकी जीवन का वह साझेदार बन गया था. शावक की अटखेलियां उसे अच्छी लगती थीं. 
इस बीच कई बार उसके हृदय ने सचेत किया. 'यह जीव तुम्हें मोह से बांध रहा है. मोह तुम्हें पुनः सांसारिकता की ओर ले जाएगा.' किंतु वह अपने तर्क से मन की चेतावनी को अनसुना कर देता था 'यदि धन संपदा, सम्मान एवं स्त्री का प्रेम मुझे बांध नही सके तो यह निरीह जीव कैसे बांध पाएगा. यह मोह नही यह तो करुणा है. करुणा बांधती नही.' 
एक बार पुनः वह समय आ गया था कि वह भिक्षा के लिए नीचे जाए. किंतु इस बार उसे शावक की चिंता थी. उसके पीछे उसे कोई हानि ना हो जाए. वह जानता था कि वहाँ कोई भी हिंसक पशु नही आता फिर भी मन नही मान रहा था. अतः उसने शावक को गुफा के भीतर कर झाड़ झंखाड़ से द्वार बंद कर दिया. 
गांव में उस दिन कोई उत्सव था. अच्छा सत्कार मिला उसे. पहली बार उसने भिक्षा में इच्छा जताई. कुछ कोमल व सरस फल शावक के लिए मांगे सब लेकर वह शीघ्र ही लौट पड़ा.
हर बार वह आराम व धैर्य के साथ चढ़ाई करता था. अतः थकावट नही होती थी. लेकिन आज उद्विग्न था. अतः तेजी से चढ़ने के कारण श्वास फूलने लगा. जब ऊपर पहुँचा तो पाया कि गुफा में लगे झाड़ झंखाड़ में एक रिक्त स्थान है. कहीं कोई व्याघ्र आदि गुफा में तो नही घुस गया. सब हटा कर वह भीतर गया और शावक को ढूंढ़ने लगा. वह वहाँ नही था. ना ही रक्त के निशान थे. लगता था शावक स्वयं ही निकल गया. वह बाहर आकर चारों तरफ उसे खोजने लगा. शावक का कुछ पता नही चला. हार कर वह भूमि पर बैठ गया. एक वेदना उसके हृदय को गहराई से भेद रही थी जैसे पुत्र विछोह के समय हुई थी. वह नेत्र मूंद कर बैठ गया. 
कुछ देर बाद यकायक ज़ोर से हंसने लगा. इतना हंसा कि आंखों में आंसू आ गए. वह बुदबुदाया "वाह री प्रकृति तू जीत गई."

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