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प्रतिद्वंदी

श्री बंसल की गिनती बड़े व्यापारियों में होती थी. लगभग हर वर्ष उन्हें सर्वश्रेष्ठ व्यापारी का पुरस्कार मिलता था. लेकिन इधर करीब दो सालों से उन्हें अपने ही बेटे से चुनौती मिल रही थी.
अनुज उनकी इकलौती संतान था. उसे लेकर उन्होंने बहुत सी योजनाएं बनाई थीं. किंतु जब अनुज ने उनके खिलाफ जाकर उनके मामूली कर्मचारी की बेटी से ब्याह कर लिया तो वह बेहद रुष्ट हो गए और उसे बेदखल कर दिया. अनुज ने इधर उधर से पूंजी जुटा कर अपना व्वसाय आरंभ किया और चार वर्ष की कड़ी मेहनत में अपने व्यापार को उस मुकाम पर ले आया जहाँ वह अपने पिता को टक्कर देने लगा. लोग दोनों पिता पुत्र को प्रतिद्वंदी के रूप में देखने लगे. पिछले दो सालों से वह अवार्ड की रेस में भी उन्हें टक्कर दे रहा था. 
इस वर्ष तो उसने बाज़ी मार ही ली. तालियों की गड़गड़ाहट में उसने पुरस्कार स्वीकार किया. फिर बोलने के लिए पोडियम पर आया. कुछ देर रुक कर बोला "थैंक्यू पापा". सभी स्तब्ध रह गए. आगे की पंक्ति में बैठे अपने पिता को देख कर आगे बोला "मेरे व्यापार की शुरुआत से अब तक आप ही मेरी प्रेरणा रहे हैं. मैंने आपको सदा पूरी लगन से काम करते देखा है. मैंने आप से सीखा है कि कैसे कठिनाइयों में हिम्मत नही हारनी चाहिए और कैसे सफलता में भी विनम्र रहना चाहिए. यह ट्राफी आपकी है." कह कर वह नीचे उतर आया और अपने पिता के चरण छू लिए. सारा हॉल तालियों के शोर से गूंज उठा. श्री बंसल ने बेटे को गले लगा लिया.

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