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नया ज़माना


संदीप स्वयं को आधुनिक मानता था. उसका कहना था कि जैसा ज़माना हो उसके अनुसार ही चलना चाहिए. ज़माने के साथ रफ्तार मिलाने में वह अक्सर यह भी नही सोंचता था कि इसका परिणाम क्या होगा.
उसके बड़े भाई अक्सर उसे समझाते थे कि जमाने के हिसाब से चलना तो ठीक है लेकिन बदलते समय के नाम पर सब कुछ सही नही ठहराया जा सकता है. हमें परिणाम सोंच कर कदम बढ़ाना चाहिए.
संदीप ने अपने बेटे को पूरी छूट दे रखी थी. वह कहाँ जाता है कब लौटता है इसकी उसको कोई फिक्र नही रहती थी. अक्सर उसका बेटा देर रात घर लौटता था किंतु संदीप उसे कुछ नही कहता था. उसके बड़े भाई ने समझाया कि बच्चों को आज़ादी देना तो ठीक है किंतु उसकी सीमा होनी चाहिए. सीमा से अधिक कुछ भी उचित नही होता है. संदीप का तर्क था कि वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता में यकीन रखता है. उसे अपने बेटे पर पूरा भरोसा है. इसलिए वह उसके जीवन में दखल नही देगा. 
एक दिन संदीप के बड़े भाई उसके घर आए हुए थे. दोनों बात कर रहे थे कि संदीप के मोबाइल की घंटी बजी. फोन थाने से आया था. उन्होंने उसे थाने में बुलाया. अपने बड़े भाई को लेकर वह थाने पहुँचा. खबर सुन कर वह सन्न रह गया. उसका बेटा एक रेव पार्टी में नशीले पदार्थ के साथ पकड़ा गया था.

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