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सूखी घास


वह छोटा सा लड़का बहुत तेजी से खुर्पी चला रहा था. वेदा ने उसे लॉन की सूखी घास छीलने को कहा था. भूख से बेहाल जब वह उसके दरवाजे पर कुछ खाने के लिए मांगने आया तो वेदा ने डांट कर कहा "तुम लोगों को तो आदत है भीख मागने की. बिना काम के कुछ नही मिलेगा." भूख से अंतड़िया खिंची जा रही थीं. किंतु कोई चारा नही था. अतः वह काम करने को तैयार हो गया. वेदा ने उसे ख़ुर्पी लाकर दी. वह घास छीलने लगा.
गर्मी के दिन थे. उसके शरीर से पसीना टपक रहा था. लेकिन इन सब बातों की परवाह किए बिना वह अपना काम कर रहा था. पेट की आग ने सारी परेशानियों का एहसास मिटा दिया था. वह तो बस सोंच रहा था कि कब काम ख़त्म हो और उसे मजदूरी मिले और वह कुछ खा सके.
बीच बीच में उसके काम का मुआयना करने वेदा बाहर आती थी. एक निगाह उस पर डाल कर इस नसीहत के साथ भीतर चली जाती कि काम ठीक से करना.
बच्चा अपना काम कर रहा था. काम करते हुए उसने नज़र डाली. अभी भी बहुत काम बचा था. वह बैठ कर सुस्ताने लगा. बैठे हुए सोंचने लगा 'आज की मजूरी मिल गई तो घर पर चूल्हा जल सकेगा.' कई दिन हो गए थे उसने ठीक से खाया नही था. उसके बापू भवन निर्माण करने वालेे ठेकेदार के पास मजदूरी करते थे. ढोला बांधने के लिए बल्ली पर चढ़े थे. गिर पड़े और पैर की हड्डी टूट गई. जो कुछ जोड़ा बटोरा था अस्पताल में लग गया. बापू ही कमाने वाले थे अब तो फाके की नौबत है. सोंचते हुए अचानक उसके मन में आया 'अगर यहाँ कुछ खाने को भी मिल जाए तो. कल रात का बचा हुआ कुछ. कितना अच्छा हो.'
वह यह सब सोंच रहा था तभी वेदा बाहर आई. साथ में उसका ऊंची नस्ल का कुत्ता भी था. उसने कुत्ते को पुचकारा और हाथ में पकड़े पैकेट से बिस्किट निकाल कर खिलाए. बच्चा ललचाई नज़रों से कुत्ते को बिस्किट खाते देख रहा था. तभी वेदा की नज़र उस पर पड़ी. उसने घुड़का "बैठे बैठे क्या कर रहे हो. जल्दी काम करो. मैं सारा दिन बैठी नही रहूँगी." उसकी डांट सुन कर बच्चा फिर से काम करने लगा.

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