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अपना घर


अपर्णा ने रिटायर होने के बाद अपने भाई के साथ रहने का फैसला किया. पिता की असमय मृत्यु के बाद सबसे बड़ी संतान होने के कारण परिवार की ज़िम्मेदारियां उस पर आ गईं उन्हें उठाते हुए वह अपना परिवार नही बसा पाई. परंतु इस बात का उसे कोई अफसोस नही था. भाई के परिवार को वह अपना परिवार समझती थी. दिल खोल कर उन पर खर्च करती थी. तीज त्यौहारों पर जब वह आती थी तो उसका खूब स्वागत भी होता था. अब तक नौकरी के चलते वह अकेले  दूसरे शहर में रहती थी.
उसने जो थोड़ा बहुत ज़रूरी सामान एकत्र किया था उसे जरूरतमंदों को दे दिया. जो बचा उसे बेंच कर पैसा अपनी नौकरानी को दे दिया. भाई की भरी पूरी गृहस्ती में बेकार जगह घेरते. सब समेट कर वह भाई के घर चली गई.
वहाँ पहुँची तो उसे लगा कि इस बार उसे पहले की तरह स्वागत नही मिला. रात को जब खाने बैठी तो भाभी ने पूँछा "यहाँ किराए पर मकान लेंगी या अपना फ्लैट खरीदेंगी."
खाते हुए अपर्णा बोली "सोंच रही थी कि एक आध हफ्ता रह कर देखूं. अच्छा लगा तो यहीं मकान ले लूंगी नही तो अपने शहर लौट जाऊंगी."

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