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ठेस


मैं छुट्टियां मनाने इस हिल स्टेशन पर आया था. शाम के वक्त मैं यूं ही बाजार में घूमने के लिए निकला था. सड़क के किनारे फुटपाथ पर कई प्रकार की वस्तुएं बिक रही थीं लोग चिन्ह के रूप में ले जाने के लिए उन्हें खरीद रहे थे.
घूमते हुए फुटपाथ पर बैठे एक लड़के पर मेरी दृष्टि पड़ी. वह करीब चौदह पंद्रह साल का होगा. उसके कपड़ों से पता चल रहा था कि वह बहुत गरीब था. बड़ी तन्मयता के साथ वह कागज़ पर सामने खड़े व्यक्ति का चित्र बना रहा था. पास खड़े व्यक्ति ने बताया कि कुदरत ने उसे बोलने की शक्ति नही दी था. किंतु उसकी भरपाई करने के लिए उसे कमाल का हुनर दिया था. कुछ ही मिनटों में वह सामने खड़े व्यक्ति का चेहरा हूबहू कागज़ पर उकेर देता था.
उसके चेहरे की मासूमियत मुझे आकर्षित कर रही थी. उसकी गरीबी पर मुझे तरस आ गया. मैं उसकी मदद करना चाहता था. अपनी लापरवाह तबियत के कारण मैं चीज़ें संभाल कर नही रख पाता था. अतः अपना चित्र बनवाने का खयाल मैंने त्याग दिया. मैने जेब से सौ रूपये निकाल कर उसे पकड़ाए और आगे बढ़ने लगा. उसने बढ़ कर हाथ पकड़ लिया. मेरे दिए हुए पैसे उसने मुझे वापस कर दिए. मेरी ओर वह खमोशी से देख रहा था. उसकी खामोशी मुखर थी. मैने उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई थी.

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