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लालच


रत्ना जब स्कूल से लौटी तो घर के दरवाजे पर एक आदमी उसके बापू से बात कर रहा था. उस आदमी ने रत्ना को ऊपर से नीचे तक देखा. उसका इस प्रकार देखना रत्ना को अच्छा नही लगा. वह भीतर चली गई. कुछ देर में उसके बापू भी भीतर आ गए. रत्ना ने खाना परोसा और अपने बापू के साथ खाने लगी.
खाना खाते हुए उसके बापू ने कहा "अब तुम यहाँ नही रहोगी. कल तुमको शहर भेज रहा हूँ. वहाँ तुम बड़े मजे से रहोगी."
अपने बापू की बात सुन कर रत्ना परेशान हो गई. कुछ सोंच कर बोली "पर बापू मुझे तो पढ़ना है."
"बहुत पढ़ लिया तुमने. लड़कियों का ज्यादा पढ़ना ठीक नही." उसके बापू ने घुड़का.
"पर टीचरजी तो कुछ और कहती हैं." रत्ना ने अपनी बात कहनी चाही. किंतु उसके बापू ने जोर से डांटा "यह तेरी पढ़ाई के कारण ही तू इतनी ढीट हो गई है कि बाप से बहस करती है."
रत्ना सहम कर चुप हो गई.
रत्ना उदास हो गई. बाहर खेलने भी नही गई. रात को भी बिना खाए सोने चली गई. लेटे हुए वह सोंच रही थी कि यदि अम्मा जिंदा होती तो ऐसा ना होता.
सुबह उसके बापू ने उसे जल्दी उठा दिया. वह आदमी जो कल आया था वह उसे लेने आ गया था. वह बेमन से तैयार हुई और उसके साथ चल दी. एक बार मुड़ कर उसने घर को देखा. उसकी आंखें भर आईं.
उन दोनो के जाते ही रत्ना के बापू ने दरवाजा बंद कर लिया. जेब से नोटों का बंडल निकाला. उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई.

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